कफील खान को मिली क्लीनचिट, फिर सत्तर बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन

करीब दो साल की जद्दोजहद के बाद आखिरकार डाक्टर कफील खान के माथे पर चस्पां कातिल का ठप्पा हट ही गया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के घर में दिल दहलाने वाली घटना घटी थी. उस घटना में सत्तर बच्चों की मौत हो गई थी लेकिन योगी आदित्यनाथ की सरकार ने दोषियों पर कार्रवाई करने की बजाय उन कफील खान पर कार्रवाई की जिन्होंने उस वक्त बच्चों को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी. लेकिन सरकार ने उन्हें ही मुजरिम ठहराया. उन्हें जेल में बंद कर दिया. करीब आठ महीने की लड़ाई के बाद वे जेल से बाहर आए और अपनी लड़ाई को जारी रखा. इस बीच न तो उन्हें तनख्वाह दी गई न ही बकाया. नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. सरकार ने अदालतों की भी नहीं सुनी और कफील खान पर बंदिशें जारी रखीं. करीब दो साल की लड़ाई के बाद गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के निलंबित शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर कफ़ील ख़ान विभागीय जांच में निर्दोष पाए गए. बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में दस अगस्त 2017 को ऑक्सीजन की कमी से कई बच्चों की मौत हुई थी. डॉक्टर कफ़ील को लापरवाही, भ्रष्टाचार और ठीक से काम नहीं करने के आरोप में निलंबित कर दिया गया था. लेकिन अब विभागीय जांच रिपोर्ट में डॉक्टर कफ़ील को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया है. इससे पहले डॉक्टर कफ़ील ख़ान इन्हीं आरोपों में आठ महीने की जेल काट चुके हैं. ये जांच रिपोर्ट इस साल 18 अप्रैल को ही आ गई थी लेकिन डॉ कफ़ील को करीब पांच महीने बाद दी गई. यह भी अपने आप में सवाल है और इससे सरकार की नीयत पर शक होना लाजमी है. क्लीनचिट मिलने के बाद डॉ. कफील ने कहा कि क्लीनचिट मिलने से वे काफी खुश हैं. जांच रिपोर्ट में आने में करीब दो साल लग गए हालांकि उनको न्याय की उम्मीद थी. लेकिन दो सालों तक उनके परिवार ने कई तरह के अजाब झेले. कफील खान के मुताबिक मैं काफ़ी ख़ुश हूं मुझे सरकार से ही क्लीनचिट मिली है. पर मेरे दो साल वापस नहीं आ सकते. अगस्त 2017 में गोरखपुर में लिकविड ऑक्सिजन की कमी से 70 बच्चों की मौत हुई थी. मैंने बाहर से ऑक्सीजन सिलेंडर मंगवा कर बच्चों की जान बचाई. उस समय के बड़े अधिकारियों और स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह को बचाने के लिए मुझे फंसाया गया. मुझे करीब नौ महीनों के लिए जेल भेज दिया गया जहां टॉयलेट में बंद कर दिया जाता था. जब मैं जेल से लौटा तो मेरी छोटी बेटी ने मुझे पहचाना तक नहीं. मेरा परिवार सौ-सौ रुपए के लिए मोहताज हो गया था'. कफील के मुताबिक मेरे भाई पर हमला कराया गया. अप्रैल 2019 को सरकार की जांच पूरी हो गई थी पर मुझे अब यह रिपोर्ट सौंपी गई है. मैं चाहता हूं कि जो 70 बच्चे मरे उनको इंसाफ मिले. मैं उम्मीद करता हूं कि योगी सरकार मेरा निलंबन वापस लेगी.गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दस अगस्त 2017 को ऑक्सीजन की कमी की वजह से कई बच्चों की मौत हो गई थी. अखबारों और सोशल मीडिया में डॉ कफील को हीरो बताया गया क्योंकि उन्होंने बाहर से सिलेंडर मांगकर कई बच्चों की जान बचाई लेकिन 22 अगस्त को डॉ. कफील को लापरवाही बरतने और तमाम गड़बड़ियों के आरोप में निलंबित कर दिया गया. दो सितंबर 2017 को डॉक्टर कफील को जेल भेज दिया गया. उन्हें 25 अप्रैल 2018 को करीब आठ महीने बाद जमानत मिली. मार्च 2019 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि डॉ. कफील की जांच पूरी होने के बाद नब्बे दिन के अंदर उनको सौंपी जाए. यह जांच रिपोर्ट 18 अप्रैल, 2019 को आ गई थी. लेकिन कफील को 26 सितंबर को दी गई. निलंबित बाल रोग विशेषज्ञ कफील खान ने मांग की कि उन्हें पूरे सम्मान के साथ बहाल किया जाए और मामले की सीबीआई से जांच कराई जाए. खान ने कहा कि उत्तरप्रदेश सरकार को मृतक बच्चों के परिजन से माफी मांगनी चाहिए और उन्हें मुआवजा दिया जाना चाहिए. हालांकि, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने दलील दी कि डॉक्टर निजी क्लीनिक चलाते थे. जांच में यह आरोप गलत साबित नहीं हुआ है. एक बयान में उन्होंने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि विभागीय जांच में डॉक्टर कफील को क्लीनचिट मिल गई है. उन्होंने रिपोर्ट के गलत निष्कर्ष निकाले हैं. हालांकि उनके इस दावे को लोग कुतर्क ही मान रहे हैं. सवाल यह है कि बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन है और उन मुजरिमों के खिलाफ सरकार क्या कार्रवाई करेगी. कफील ने दावा किया कि विभागीय जांच में दिखाया गया है कि मैंने कोई चिकित्सकीय लापरवाही नहीं की या मैं भ्रष्टाचार में संलिप्त नहीं था. अब ‘हत्यारा कफील' और कुख्यात डॉक्टर कफील का चस्पां दाग धुल गया है. उन्होंने कहा कि मैं मांग करता हूं कि मुझे पूरे सम्मान के साथ नौकरी पर बहाल किया जाए और मामले की सीबीआई जांच कराई जाए. गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में अगस्त 2017 में करीब 70 बच्चों की मौत हो गई थी. लेकिन सरकार ने इस पर परदा डालने के लिए डाक्टर कफील को इसके लिए जिम्मेदार माना जबकि कफील ने बच्चों को बचाने की कोशिश ही की थी. सवाल तो अब भी बरकरार है कि क्या सरकार तबके स्वास्थय मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह और अस्पताल के बड़े डाक्टरों को बचाने में लगी थी. इस सवाल का जवाब फिलहाल सरकार नहीं दे रही है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).

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