मीडिया के सवालों से भागते नीतीश कुमार और जल जमाव से परेशान लोग

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पत्रकारों के सवाल से गुस्से में हैं. वाजिब भी है उनका गुस्सा. मीडिया को पंद्रह सालों से साध कर रखा है उन्होंने. अखबारों पर सरकार विरोधी खबरें छापने पर एक तरह का अघोषित सेंसरशिप लगा रखा है. अखबार के संपादकों को निर्देश है कि वे पहले पेज पर उनकी तसवीर तो छापें ही और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खबरों की तरह ही उनकी खबरों का डिस्पले दें. अखबार वालों को यह अघोषित निर्देश देकर रखा गया है इसलिए नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद व्यवस्था और सत्ता विरोधी खबरें अखबारों से लगभग गायब हो गईं. यह अघोषित सेंसरशिप लगभग 2005 से ही पटना की मीडिया पर है. इसलिए सृजन घोटाला से लेकर मोबइल घोटाले की खबरें, अखबारों में जगह नहीं पाती रहीं हैं. राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया पर कब्जे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की चर्चा तो होती है लेकिन सच तो यह है कि बिहार में यह काम उससे कहीं पहले से नीतश कुमार ने किया. अखबारों को सरकारी विज्ञापन का लालीपाप देकर अपने खिलाफ खबरों को छपने से रोकने की लगातार कोशिश उन्होंने की. नीतीश कुमार को लेकर तो कभी यह भी कहा जाता है कि अखबारों के वे अघोषित प्रधान संपादक हैं. अखबारों में नीतीश कुमार के खिलाफ खबरें अब भी नहीं छपती है. किसी तरह की खोजी खबर तो दिखाई ही नहीं देती. कुछ अखबारों ने ऐसा किया तो उनका विज्ञापन सालों बंद रहा. हाल के कुछ सालों में चैनलों ने जरूर यह हिम्मत की. शेल्टर होम घोटाला से लेकर कुछ दूसरी सरकार विरोधी कबरें चलाईं जरूर लेकिन उस पर भी नीतीश कुमार का अंकुश रहा. विपक्ष की कितनी खबरें दिखानी-चलानी या छापनी है आज भी नीतीश कुमार तय करते हैं, इसकी चर्चा सियासी गलियारों में खूब है. पटना में जल जमाव ने लोगों का जीना दूभर कर दिया तो सवाल नीतीश कुमार से पूछे जाने लगे. पत्रकारों ने घेरा. दिल्ली से आए पत्रकारों ने उनसे सवाल पूछे. सवाल नीतीश कुमार को पसंद नहीं आया. वे असहज हो उठे. अमेरिका से लेकर मुंबई-चेन्नई तक की बारिश का जिक्र करने लगे. पत्रकारों के साथ जिस भाषा में बात की वह ठीक नहीं कही जा सकती. उनकी निष्ठा पर सवाल उठाया. उनके साथ धक्का-मुक्की भी हुई. महिला पत्रकार को यह लड़की कह कर संबोधित किया. यानी जितना गुस्सा निकालना था, निकाला. उनके चंगू-मंगू ने भी पत्रकारों को बेइज्जत किया. मंगलवार की रात पत्रकारों से बदसलूकी तो हुई ही, बुधवार को भी कई पत्रकारों को नीतीश कुमार के अधिकारियों ने हड़काया. उनका माइक छीना, उनका कार्ड देखा. डीएम और सिटी एसपी का आदेश था कि चैनलों के पत्रकारों को नीतीश कुमार से दूर रखा जाए. पटना की बारिश को जब नीतीश कुमार चेन्नई, मुंबई और अमेरिका से मिला रहे थे तो पत्रकार उनसे पटना पर सवाल दर सवाल कर रहे थे. फिर सुशील मोदी को बचाए जाने पर सवाल हुआ तो नीतीश की बौखलाहट उनके चेहरे पर लिखी इबारत से भी पढ़ी जा सकती थी और उनकी भाषा से भी. सवालों से असहज हुए नीतीश कुमार ने गांधी जयंती पर कहा कि हम अपना प्रचार नहीं करते. जो काम नहीं करता वह केवल प्रचार करता है, लेकिन जितनी मेरी आलोचना है, कीजिए. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मीडिया की भूमिका से आहत दिखे. हालांकि उनके प्रचार वाले बयान पर भी लोग खूब चुटकी ले रहे हैं. नीतीश कुमार अपना चेहरा चमकाने में कहीं से भी पीछे नहीं रहते. अखबारों को साधने के पीछे की कहानी तो इसी आत्मप्रचार के लिए उन्होंने किया है. लेकिन सार्वजनक मंच से नीतीश कुमार का गुस्सा झलका. उन्होंने मंगलवार की शाम को कुछ मीडिया चैनलों द्वारा उनके खिलाफ अभद्र भाषा के प्रयोग पर कहा कि उन्हें प्रचार पर भरोसा नहीं, बल्कि काम करते हैं. लेकिन जो लोग काम नहीं करते वे अपना प्रचार ख़ूब करते हैं. हालांकि भाषा के स्तर पर नीतीश कुमार ने जिस तरह से महिला पत्रकार को वह लड़की को देखिए कैसे चिल्ला रही है कहा, इससे नीतीश की झल्लाहट को समझा जा सकता है. नीतीश ने कहा कि हम मीडिया वालों से प्रेम करते हैं लेकिन मंगलवार शाम जब एक श्राद्ध के कार्यक्रम में भाग लेने गए तो कुछ मीडिया वाले चिल्लाने लगे. उन्होंने साफ किया कि लोगों को उनकी आलोचना का अधिकार है और वे उसका स्वागत भी करते हैं. नीतीश ने कहा कि हमारे मीडिया वाले हम उनको प्रणाम करते हैं, क्या-क्या लैंग्वेज है भाई. नीतीश ने कहा कि एक कार्यक्रम में चिल्ला-चिल्लाकर सवाल पूछे जाने लगे. नीतीश ने कहा कि तो भाई आखिर इसका क्या अर्थ होने वाला है. कहां ले जाना चाहते हैं समाज को, किस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं. आपको कोई भ्रम है क्या कि आपकी भाषा के प्रयोग करने से कुछ होता है. कुछ नहीं होता है. जनहित में जनता के हित में जो काम किया जाता है हम उसके लिए पूरे तौर पर समर्पित हैं. हम प्रचार के लिए समर्पित नहीं हैं और आज के युग में जो काम नहीं करता है, वे अपना प्रचार खुद करवाता है. नीतीश ने मीडिया से कहा कि जितनी मेरी आलोचना करना है, मन से कीजिए लेकिन थोड़ा समाज का भी ख्याल कीजिए. हम सबसे अपील करेंगे मेरे खिलाफ, मेरे जैसे व्यक्ति को डुबाने के लिए जो करना है कीजिए लेकिन इतना जरूर है कि समाज में प्रेम का भाव नहीं आना चाहिए. आजकल समाज में जो टकराव की स्थिति और तनाव की स्थिति पैदा की जा रही है, इसमें क्या रोल नहीं है. किस तरीके की भाषा बोल रहे हैं. इस तरीके की भाषा बोलने से क्या समाज सुधर सकता है. समाज आगे बढ़ सकता है. ज़रूर कमियों को उजागर कीजिए इसमें कोई श़क नहीं. समाज में थोड़ा सौहार्द बनाना चाहिए.उन्होंने कहा कि आज तक मैंने किसी की मर्यादा पर असर डालने की कोशिश नहीं की है. हम तो यही कोशिश करते हैं कि सब लोगों की मर्यादा रहे. आप दूसरे के विचार से असहमत हों, सबका अपना अधिकार है लेकिन विचार से असहमत होने का मतलब यह नहीं है कि इस तरीके का वातावरण और व्यवहार करना चाहिए कि दोनों के बीच झगड़ा हो. अपने विचारों को जरूर रखें, लेकिन असहमत हैं तो झगड़ा मत कीजिए. नीतीश कुमार जो भी कहें लेकिन मीडिया को लगातार साधने वाले नीतीश कुमार परेशाना हैं. पटना में जल जमाव के बाद उन पर सवाल खड़े हो रहे हैं. विपक्ष भी हमलावर है और भाजपा भी. मीडिया भी उनके पंद्रह साल के तैरते सुशासन को दिखाने में कोताही नहीं कर रहा है और यह बात नीतीश कुमार को बेतरह परेशान कर रही है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).

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