छात्रसंघ चुनाव में हार के लिए अब सचिन पायलट किसे जिम्मेदार ठहराएंगे?

एसपी मित्तल 
लोकसभा चुनाव में राजस्थान की सभी 25 सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों की हार पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और सरकार में डिप्टी सीएम रह कर सत्ता का सुख भोग रहे सचिन पायलट ने कहा था कि सरकार में बैठे लोगों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि विधानसभा में जीतने के बाद हम लोकसभा में क्यों हार गए? हमें हार के कारणों का पता लगाना चाहिए।
पायलट की यह टिप्पणी अशोक गहलोत के नेतृत्व में चल रही सरकार के कामकाज को लेकर थी। अब प्रदेश के अधिकांश कॉलेज और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव में भी कांग्रेस के अग्रिम संगठन एनएसयूआई के उम्मीदवार हार गए हैं तो सवाल उठता है कि इस हार के लिए पायलट किसे जिम्मेदार ठहराएंगे? हालांकि पिछले 6 वर्षों में पायलट ने कांग्रेस संगठन का जो ढांचा खड़ा किया, उसी से जुड़े नेताओं ने ही छात्रसंघ चुनाव में उम्मीदवार तय किए। प्रदेश में नवम्बर माह में अनेक स्थानीय निकायों तथा अगले वर्ष जनवरी में पंचायतीराज के चुनाव होने हैं, तब अगस्त माह में प्रदेश के 11 विश्वविद्यालयों में से मात्र दो पर एनएसयूआई के उम्मीदवार जीते हैं। यानि 9 विश्वविद्यालयों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। 11 में से 5 पर भाजपा समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद तथा 4 विश्वविद्यालयों में निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं। कमोबेश यही स्थिति प्रदेश भर के कॉलेजों की रही हैं। इससे कांग्रेस का कार्यकर्ता भी मायूस हैं। असल में पायलट ने प्रदेशाध्यक्ष रहते जिन लोगों को जिलाध्यक्ष बनाया, उनकी संगठन पर कोई पकड़ नहीं है। चूंकि ऐसे अध्यक्षों ने अपने समर्थक भरे, इसलिए कार्यकर्ताओं का जुड़ाव नहीं है। छात्र संघ में एनएसयूआई के उम्मीदवारों की हार के लिए कांगे्रस जिलाध्यक्षों को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। क्या छात्र संघ चुनाव में मिली हार के लिए भी सचिन पायलट सरकार की ओर इशारा करेंगे? लोकसभा चुनाव में हार पर जो सवाल पायलट ने उठाया था उसका जवाब अभी तक नहीं आया है। नवम्बर में जिन शहरी निकायों के चुनाव होने हैं, वहां नगर पालिका के अध्यक्ष और नगर परिषद के सभापति का चुनाव सीधे तौर पर होगा। यानि संबंधित शहर के सभी मतदाता अध्यक्ष या सभापति चुनेंगे। छात्रसंघ चुनाव की हार से स्थानीय निकायों के परिणाम का अंदाजा कांग्रेस को लगा लेना चाहिए। हालांकि सचिन पायलट स्वयं कांग्रेस सरकार में डिप्टी सीएम की हैसियत से शामिल हैं, लेकिन पायलट कभी भी सरकार के कामकाज की जिम्मेदारी नहीं लेते। प्रदेशाध्यक्ष के तौर पर पायलट हमेशा अपनी ही सरकार पर हमलावर रहते हैं। 19 अगस्त को पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की जयंती पर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय पर आयोजित सभा में भी पायलट ने सरकार पर हमला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस सभा में सीएम अशोक गहलोत भी उपस्थित थे।
मंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में भी हार
छात्रसंघ चुनाव में एनएसयूआई के उम्मीदवारों को जीताने की अपील करने वाले मंत्रियों में केकड़ी के विधायक और प्रदेश के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा भी शामिल थे। रघु ने भी सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों को जीताने की अपील की थी, लेकिन एनएसयूआई का उम्मीदवार रघु के निर्वाचन क्षेत्र केकड़ी के गर्वमेंट कॉलेज में हार गया। जब रघु शर्मा अपने निर्वाचन क्षेत्र से ही एनएसयूआई के उम्मीदवार को नहीं जितवा सकते तो प्रदेशभर में रघु की अपील के असर का अंदाजा लगाया जा सकता है। गत लोकसभा चुनाव में भी केकड़ी से कांग्रेस उम्मीदवर रिजु झुनझुनवाला भी हजारों मतों से पिछड़ गए थे। केकड़ी कॉलेज के प्रमुख चारों पदों पर एनएसयूआई को हार मिली। एनएसयूआई के उम्मीदवार रघु की सहमति से ही तय हुए थे। चिकित्सा मंत्री  बनने के बाद केकड़ी में वो ही होता है जो रघु चाहते हैं। मंत्री होने के नाते रघु ही अजमेर जिले का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए 15 अगस्त को जिला स्तरीय समारोह में रघु ने ही झंडरोहण किया। लेकिन अजमेर जिले के मात्र दो कॉलेजों में एनएसयूआई के अध्यक्ष बन पाए हैं। ब्यावर में तो मात्र 3 मतों से जीत हो पाई है। एमडीएस यूनिवर्सिटी से लेकर पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय तक में एनएसयूआई को हार का सामना करना पड़ा है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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