पटना का जलप्रलय प्राकृतिक या दैवी नहीं, मानव-निर्मित आपदा

ध्रुव गुप्त 
पटना का जलप्रलय प्राकृतिक या दैवी नहीं, मानव-निर्मित आपदा है। यह समस्या कमोबेश हर साल सामने आती है। शहरीकरण की आपाधापी में हम सबने प्रकृति के साथ सामंजस्य की अपनी प्राचीन कला भुला दी है। ऋतुचक्र है तो बारिश होगी ही। कभी कम और कभी ज्यादा। अतिवृष्टि की समस्या से निबटने के लिए पहले हर शहर और गांव में जलाशय और कुएं हुआ करते थे।

बारिश के अतिरिक्त पानी को कुछ ही घंटों में वे अपने भीतर समेट लेते थे। जलाशयों का यह जल गर्मी के महीनों या सूखे के हालात में शहरों और गांवों के लाइफलाइन हुआ करते थे। इतिहास बताता है कि पटना शहर में किसी समय दर्जनों बड़े-बड़े तालाब और कुएं थे। पिछले पचास-साठ सालों में आवासीय कालोनियां, सड़कें और मॉल बनाने की जल्दबाज़ी में हमने तमाम तालाब और कुएं पाट दिए।

बारिश का पानी जाए तो कहां जाए। गंगा में उसका धीरे-धीरे गिरना तभी संभव है जब गंगा सामान्य हो। अभी उफनती हुई गंगा खतरे के निशान से बहुत ऊपर बह रही है। उसका सतह नीचे आ भी गया तो जल निकासी की व्यवस्था ध्वस्त है। शहर के तमाम नालों को प्लास्टिक के कचरे ने अवरुद्ध कर रखा है। पम्प से पानी निकालने की कोशिशें अभी मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं।ऐसा करके हम एक मोहल्ले का पानी किसी दूसरे मोहल्ले में फेंक रहे हैं।

पटना की यह समस्या देश के लगभग हर शहर की समस्या है। इसका समाधान पंप से पानी निकालना नहीं, शहर के हर मोहल्ले में बड़े जलाशय बनाना और शहर के नालों को अवरोध से मुक्त करना है। सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन को कड़ाई से लागू कर नालों की समस्या से निजात पाया जा सकता है। शहरों में बड़े-बड़े जलाशयों के निर्माण की पहल के लिए क्या सरकार तैयार है?
(लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं)

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