उप्र : आवारा गोवंश के लिए ढूढ़े नहीं मिल रहे गौपालक, अधिकारी निराश

बांदा, 13 सितम्बर (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड के बांदा जिले में अन्ना (आवारा) गोवंश को घर-घर पालने की योगी सरकार की मुहिम को झटका लग सकता है। यहां हालात यह है कि महत्वाकांक्षी योजना के लिए अधिकारियों को गौपालक ही ढूंढ़े नहीं मिल रहे हैं।

इस योजना के प्रथम चरण में जिले की सरकारी गौशालाओं से जिओ टैग युक्त 414 गोवंश को निजी पशुपालकों को सौंपा जाना था। इसमें से अभी तक सिर्फ 42 गोवंश को लेने के लिए 24 लोगों ने आवेदन किया है। पर्याप्त मात्रा में आवेदन न आने से फिलहाल हस्तांतरण की प्रक्रिया आरंभ नहीं की गई है। प्राप्त आवेदन जिले के लिए आवंटित लक्ष्य का मात्र 10 फीसदी ही हैं। मुख्यमंत्री निराश्रित बेसहारा गोवंश सहभागिता योजना की शुरुआत आठ अगस्त को हुई थी।

जिला मुख्य पशु चिकित्साधिकारी/मुख्य पशुपालन अधिकारी (सीवीओ) डॉ. आई.एन. सिंह ने शुक्रवार को बताया, पर्याप्त मात्रा में आवेदन न आने से हम निराश हैं। अब तक एक महीने में सिर्फ 24 आवेदन आए हैं। इस योजना की शुरुआत पिछले महीने 8 अगस्त को शासन से प्राप्त पत्र के आधार पर हुई थी। जिसमें प्रति गोवंश 30 रुपये प्रतिदिन यानी 900 रुपये प्रति माह के हिसाब से प्रत्येक गौपालक को दिए जाने का प्रावधान है। प्रति पालक अधिकतम चार गोवंश दिए जा सकते हैं। पशुओं को रखने और चारे का इंतजाम गौपालक को करना होगा।

उन्होंने बताया, इसका भुगतान प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के तहत पशुपालक के बैंक खाते में किया जाएगा। लेकिन लोगों के दिलचस्पी न लेने से यह प्रक्रिया अभी सिर्फ आवेदन के स्तर तक सीमित है, जिससे विभागीय अधिकारी निराश हैं।

जिलाधिकारी हीरालाल ने कहा, अन्ना समस्या एक व्यापक समस्या बन गई है। इसके निदान के लिए समाज के सभी लोगों का सहयोग चाहिए। लेकिन लोगों का जो सहयोग मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पा रहा है। इसके लिए अब व्यापक स्तर पर प्रचार कर लोगों को जोड़ा जाएगा।

पुलिस अधीक्षक गणेश प्रसाद साहा ने बताया, उन स्थानों को चिन्हित किया गया है, जहां सड़कों में जानवर बैठते हैं। जिससे आए दिन हादसे हो रहे थे। लोग ऐसी जगहों में गाड़ी धीरे और सावधानी से चलाएं। इसके लिए हमने जिले की प्रमुख सड़कों पर जगह-जगह चेतावनी बोर्ड लगवाए हैं।

मुख्य पशुपालन अधिकारी सिंह ने बताया, इस योजना के तहत अभी तक एक भी गोवंश गौपालकों को नहीं सौंपा गया है। जिले की तीन कान्हा गौशालाओं से जिओ टैग युक्त 414 गोवंशों को लोगों को सौंपा जाना था, जिसका आवेदन कोई भी व्यक्ति अपने खंड विकास कार्यालय या तहसील में जाकर दे सकता है। उसके बाद गोवंश को आठ बिंदुओं, जिनमें जिओ टैग नम्बर, प्रजाति, उम्र, लिंग, सींग, दुधारू है या नहीं और उसकी संतान का विवरण नोट कर आवेदक को सरकारी गौशाला से सुपुर्द कर दिया जाएगा। अब तक करीब 10,750 गोवंशों की जिओ टैगिंग हो चुकी है और तीन कान्हा गौशालाओं में 1,111 गोवंश रहे रहे हैं।

इसके अलावा सरकारी सहायता प्राप्त गौ आश्रय केंद्रों को मिलाकर कुल 15 हजार गोवंशों के संरक्षण का दावा जिला प्रशासन करता आया है। कम टैगिंग के आंकड़ों पर पशुपालन अधिकारी पर्याप्त स्टाफ न होने का हवाला देकर अपनी मजबूरी जता रहे हैं।

अतरहट गांव के किसान मायादीन ने बताया, सरकार द्वारा दिया जाने वाला 30 रुपये बहुत कम है। इसे कम से कम 80 से 100 रुपये प्रतिदिन होना चाहिए। 30 रुपये में तो एक पशु के पीने के लिए पानी भी नहीं मिलेगा।

--आईएएनएस

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