दिल्ली में खून-खराबा : शांत पुलिस पर ही हावी होता है बदमाश

देश के मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रहे दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त अजय राज शर्मा ने राष्ट्रीय राजधानी में बीते एक महीने में अचानक बढ़े अपराधों पर शनिवार को आईएएनएस से यह बात कही।

भारत में स्पेशल टास्क फोर्स के जन्मदाता कहे जाने वाले शर्मा ने कहा, जिस तरह आजकल दिल्ली में पुलिस पर फायरिंग, दिन-दहाड़े डीसीपी के कार्यालय के पास कार में बैठी महिला की गोली मारकर हत्या या फिर कार की बोनट पर चढ़कर बदमाश निहत्थे इंसानों को गोलियों से भून रहे हैं, वह साबित करने के लिए काफी है कि पुलिस शांत है। बदमाश तभी बोलना (अपराध करना) शुरू करता है, जब उसे पुलिस शांत दिखाई देने लगती है।

यानी आप कहना चाहते हैं कि दिल्ली पुलिस इन दिनों सो रही है? शर्मा ने कहा, मैं वही कह रहा हूं जो देख-सुन रहा हूं। और जो मैं कह रहा हूं वह 36-37 साल पुलिस की नौकरी के अनुभव से कह रहा हूं। पुलिस का खौफ अगर बदमाश के दिल-दिमाग पर बैठा हो तो, भला बेमौत मरना किसे अच्छा लगता है?

सीमा सुरक्षा बल के सेवानिवृत्त महानिदेशक ने आगे कहा, जब तक बदमाश को खुद की मौत और कानून का भय नहीं होगा, वह पब्लिक और पुलिस दोनों पर हावी होने की गफलत में ही रहेगा।

राष्ट्रीय राजधानी में दिन-दहाड़े मची लूटपाट और खून-खराबे की घटनाओं पर सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक और दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त नीरज कुमार ने आईएएनएस से कहा, अपराधी एक दिन में और अचानक नहीं बढ़ता-चढ़ता है। वह पहले पुलिस की थाह लेता है। जैसे ही उसे लगता है कि अब पुलिस लापरवाह हो चुकी है, बस उसी समय वह आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने पर उतर आता है। और फिर उसे काबू करने के लिए पुलिस को कहीं ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है।

किसी जमाने में अंडरवल्र्ड का सबसे कुख्यात सरगना रहे दाऊद इब्राहिम को भी पनाह मंगवा देने वाले नीजर कुमार ने कहा, पुलिस हमेशा अगर सजग रहे तो बदमाश को जो मौके कभी-कभार हाथ लग जाते हैं, वे उसे नसीब ही नहीं होंगे। बदमाश को ठंडा रखने के लिए पुलिस को हमेशा तैयार रहना ही होगा।

अजय राज शर्मा कहते हैं, पुलिस-कानून का भय बदमाश के जेहन से गायब होता जा रहा है, जो पब्लिक और पुलिस दोनों के हित में कतई नहीं है। बदमाश एक दिन में सीधे गोलियां दागने नहीं पहुंच जाता है। वह पुलिस के सोने का इंतजार करता है। और जब बदमाश की गोलियों से पुलिस जागती है तो बदमाश गायब हो चुका होता है। इसका सबसे ज्यादा और सीधा नुकसान जनता को ही होता।

दिल्ली के एक अन्य पूर्व पुलिस आयुक्त ने नाम न छापने की शर्त पर आईएएनएस से कहा, जो बदतर हालत आज दिल्ली में कानून-पुलिस की है, उन हालातों में दिल्ली पुलिस के पास फिलहाल तो ऐसा कोई मैजिक-फार्मूला मुझे नहीं दिखता जो वह एकदम अपराधों पर काबू पा ले। पुलिस ने जितना ज्यादा वक्त बदमाशों को शहर में कोहराम मचवाने के लिए दिया है, उससे कहीं ज्यादा वक्त और मेहनत पुलिस को इन बदमाशों को काबू करने में लगना तय है।

दिल्ली के इसी पूर्व पुलिस आयुक्त ने दिल्ली पुलिस को खरी-खरी सुनाते हुए कहा, दरअसल, पुलिस ही एक वह महकमा है, जिसमें सब कुछ ऊपर (पुलिस आयुक्त) से शुरू होकर ऊपर (पुलिस आयुक्त) ही पहुंचकर खत्म होता है। जब तक पुलिस आयुक्त का कड़ा और साफ-साफ संदेश सड़क पर पब्लिक के बीच घूम रहे सिपाही तक नहीं पहुंचेगा कि आखिर उसे बदमाशों से मोर्चा लेना कैसे है? तब तक कुछ नहीं हो सकता। चाहे वह दिल्ली हो, यूपी हो या फिर मुंबई।

कभी सीबीआई में रहते हुए अपहरण की दुनिया के सबसे बड़े नाम रहे आफताब अंसारी को सात समुंदर पार से लाकर भारत की जेल में बंद कराने का माद्दा रखने वाले एक पूर्व आईपीएस ने आईएएनएस से कहा, अभी रामलीला, नवरात्र, दशहरा का त्योहार आ रहा है। भीड़ सड़कों पर उतरेगी, तब हकीकत सामने आएगी कि दिल्ली में जाग कौन रहा है। बदमाश या फिर पुलिस?

उन्होंने आगे कहा, बदमाशों की नींद हराम करने से पहले पुलिस को अपनी भी नींद हराम करनी होगी। वरना हालात अब से ज्यादा विकराल हो जाएंगे। क्योंकि पुलिस महकमा ही एक विचित्र महकमा है, जहां अमूमन साहब से लेकर सिपाही तक के बीच सामंजस्य बैठा पाना जितना मुश्किल होता है, सच में उतना ही यह काम आसान भी हो सकता है। जरूरत है ईमानदारी और तत्परता की।

--आईएएनएस

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