‘दारुल उलूम देवबंद’ के उलेमा का आज़ादी के आंदोलन में रहा है बहुत बड़ा योगदान...

सहारनपुर। देवबंद के दारुल उलूम देवबंद को पूरी दुनिया इस्लामी संस्था के तौर पर जानती है। कम ही लोगों को मालूम होगा कि आजादी की जंग में भी इस संस्था के उलेमाओं ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
जब 1866 में अंग्रेजों ने तमाम मदरसों पर पहरा बिठाया तो दारुल उलूम की नींव रखी गई और उलेमाओं ने एक नया आंदोलन छेड़ा। जिसका नाम रखा गया ‘रेशमी रुमाल आंदोलन’। इस आंदोलन के अगुवा थे मौलाना कासिम ननोतवी।वह अपने साथी उलेमाओं के साथ अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चलाते रहे।
साल 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ जो पहली जंग हुई उसके बाद ब्रिटिश शासकों ने आम लोगों पर अत्याचार की इंतेहा कर दी थी।जगह-जगह लोगों को पेड़ों से लटकाकर फांसी दी जाने लगी। उन्हें तोपों से बांधकर उड़ाया जाने लगा। अंग्रेजी हुकूमत ने इसके साथ ही मदरसों पर भी निगरानी रखनी शुरू कर दी। कई मदरसों को बंद करा दिया गया। उसी वक्त देवबंद के उलेमाओं ने तय किया कि अब सीधी लड़ाई मुमकिन नहीं है।ऐसे में दारुल उलूम बनाकर कौम को अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा करने का बड़ा अभियान शुरू किया गया।
21 मई 1866 को दारुल उलूम की स्थापना के बाद मौलाना कासिम नानोतवी ने यहां से अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति बनानी शुरू की। जब स्टूडेंट्स को यहां भेजा जाता तो कोड वर्ड में कहा जाता ’50 किताबें आई हैं इन्हें पढ़ लेना। यानी 50 लोग हैं जिन्हें जंग-ए-आजादी के लिए तैयार करना है।
यहां के पहले छात्र थे मौलाना महमूद हसन। उन्हें शेख-उल-हिंद का खिताब दिया गया था।वह अपने साथी मौलाना हुसैन मदनी, अब्दुल गफ्फार और अब्दुल्ला सिंधी और तमाम साथियों के साथ पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ जन जागरण अभियान चलाते थे। इस वक्त तक अंग्रेजों के खिलाफ लोग और मुखर हो रहे थे।हज़ारों उलेमाओं को अंग्रेज फांसी पर चढ़ा चुके थे। ऐसे में नया आंदोलन शुरू करने का फैसला किया गया और उसे नाम दिया गया रेशमी रुमाल आंदोलन
मौलाना महमूद हसन ने 1912-13 में इस आंदोलन के तहत अफगानिस्तान, तुर्की और जर्मनी को साथ लेकर अंग्रेजों से लड़ने की रणनीति बनाई।मौलाना अबदुल्ला सिंधी को अफगानिस्तान भेजा गया।तुर्की के राष्ट्रपति को भी रेशमी रुमाल भेजा गया।इन देशों से मदद मांगी गई ताकि अंग्रेजों को देश से भगाया जा सके।

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