देह नहीं, देह के भीतर स्थित चेतना या आत्मा ही अंतिम सत्य!

ध्रुव गुप्त 
पितृपक्ष का आरम्भ हो चुका है। यह पक्ष तन और मन को निर्मल कर अपने दिवंगत आत्मीयों और पुरखों के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने का अवसर है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार देह नहीं, देह के भीतर स्थित चेतना या आत्मा ही अंतिम सत्य है। देह की मृत्यु के बाद ऊर्जा स्वरुप पवित्र वीतरागी आत्माएं ब्रह्मांडीय ऊर्जा में समाहित हो जाती हैं। इसे मोक्ष या निर्वाण की स्थिति कहते हैं।

ऐसी आत्माओं का संबंध अपने पिछले जन्मों से पूरी तरह टूट जाता है और वे लौटकर फिर पृथ्वी पर फिर नहीं आतीं। हमारी तरह जो लोग प्रेम, आकर्षण, मोह और कुछ अधूरी इच्छाएं लेकर मरते हैं वे पृथ्वी के आसपास के किन्हीं दूसरे आयामों में प्रेत बनकर भटकते हुए पुनर्जन्म के उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करते हैं। यह प्रतीक्षा कुछ दिनों की भी हो सकती है और सदियों की भी। विज्ञान कुछ अरसे पहले तक देह से परे किसी ऊर्जा, चेतना या आत्मा का अस्तित्व स्वीकार नहीं करता था। उसके अनुसार देह के साथ ही सब कुछ खत्म हो जाता है। अब विज्ञान की सोच में भी बदलाव आने लगा है।

हाल में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के गणित और भौतिकी के दो सुप्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने वर्षों के शोध से यह साबित किया है कि मनुष्य का मस्तिष्क एक जैविक कंप्यूटर की तरह है जिसका प्रोग्राम चेतना है जिसे आत्मा भी कहा जाता है। यह चेतना हमारे मस्तिष्क में मौजूद एक क्वांटम के जरिए संचालित होता है। क्वांटम से तात्पर्य मस्तिष्क की कोशिकाओं में स्थित सूक्ष्म नलिकाओं से है जो प्रोटीन आधारित अणुओं से निर्मित हैं। जब व्यक्ति दिमागी तौर पर मृत होने लगता है तब मस्तिष्क की सूक्ष्म नलिकाएं क्वांटम स्टेट खोने लगती हैं। ये सूक्ष्म ऊर्जा कण ब्रह्माण्ड में चली जाती हैं। इन ऊर्जा कणों में अपने पिछले अनुभवों की दर्ज़ स्मृतियां कभी नष्ट नहीं होती।

संभव है कि हमारे पुरखे भी अपने पिछले जन्म की यादों के साथ हमारे ब्रह्माण्ड में उपस्थित हों। अपने पूर्वजों को याद करने और उन्हें श्रद्धांजलि देने की परंपरा किसी किसी न किसी रूप में दुनिया की लगभग सभी संस्कृतियों में है। हिन्दू संस्कृति में पितृपक्ष में अपने पूर्वजों को याद करते है। इस परंपरा को रूढ़ि और अंधविश्वास मानकर खारिज़ कर देने का उतावलापन अनावश्यक ही नहीं, अवैज्ञानिक भी साबित होने लगा है। विरोध इस परंपरा के साथ कालांतर में जुड़ते चले गए असंख्य कर्मकांडों और अंधविश्वासों का होना चाहिए। कर्मकांडों से अलग अपने पुरखों को दिल से याद करना और उनके प्रति आभार प्रकट करना धार्मिक से ज्यादा एक भावनात्मक अनुभव है। अगर हमारे पूर्वजों की आत्माएं या चेतना हमारे ब्रह्मांड में कहीं मौजूद हैं तो उन्हें यह देखकर संतोष अवश्य होगा कि उनके विगत हो जाने के बाद भी उनके अपने शिद्दत से उन्हें याद करते हैं। मृत्यु के बाद अगर कुछ भी नहीं बचता तब भी अपने दिवंगत आत्मीयों और पूर्वजों को याद करने का यह संवेगात्मक अनुभव आपको थोड़ा और बेहतर इंसान बनाने में आपकी मदद तो करता ही है।

पितृपक्ष पर अपने और आप सबके ही नहीं, इस दुनिया के हमारे तमाम पुरखों को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि !
(लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं)

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