आखिर हर बार मरीज की कीमत पर डॉक्टर अपनी मांग क्यों मनवाते हैं?

एसपी मित्तल 
एक अगस्त को देशभर में सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा व्यवस्था ठप रही। अजमेर के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल से लेकर दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता आदि के एम्स अस्पतालों में मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। ऑपरेशन नहीं हुए तो ओपीडी भी नहीं लगी।

भगवान का स्वरूप माने जाने वाले डॉक्टरों के सामने मरीज दर्द से तड़पते रहे, लेकिन डॉक्टरों का दिल नहीं पसीजा। डॉक्टरों का कहना है कि जब तक केन्द्र सरकार नेशनल मेडिकल कमीशन विधेयक के नियम 32 में बदलाव नहीं करती तब तक विरोध जारी रहेगा।

पता नहीं डॉक्टरों की हड़ताल का केन्द्र सरकार पर कितना असर होगा, लेकिन यह विधेयक लोकसभा से पास हो चुका है और अगले दो-दिन में राज्यसभा से भी पास हो जाएगा। राज्यसभा से विधेयक के पास होने पर डॉक्टर कितना तांडव करेंगे, इसकी अभी जानकारी नहीं है।

लेकिन सवाल उठता है कि डॉक्टर वर्ग हर बार मरीज की कीमत पर अपनी मांग क्यों मनवाता है? डॉक्टर अपनी मांग को पूरा करवाने के लिए दूसरे रास्ते  भी अपना सकते हैं। आम मरीजों की दुआओं की वजह से डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता है। आखिर डॉक्टर वर्ग इन दुआओ को बददुआओं में क्यों बदलवाना चाहता है। डॉक्टर के अभाव में इलाज नहीं होता है तो फिर मरीज के दिल से बददुआएं ही निकलेंगी।

क्या है नियम 32
सरकार ने विधेयक के प्रावधान 32 में कम्युनिटी हेल्थ प्रेक्टीशनर की व्यवस्था की है। यानि 6 माह या एक वर्ष का प्रशिक्षण देकर किसी चिकित्साकर्मी को तैयार किया जाएगा। यह चिकित्साकर्मी जरुरतमंद खास कर ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर मौसमी या अन्य बीमारियों के लिए दवाई का वितरण करेगा। सरकार का कहना है कि इससे वंचित लोगों को भी इलाज और बीमारी से बचने के उपाय के बारे में पता चलेगा। इस विधेयक में मौजूदा चिकित्सा व्यवस्था को ज्यों का त्यों रखा गया है।

वहीं डॉक्टरों का कहना है कि एक युवक को डॉक्टर बनने के लिए 6 वर्ष का समय लगता है, जबकि सरकार 6 माह के प्रशिक्षण में डॉक्टर बना रही है, इससे मरीजों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। सरकार की यह व्यवस्था जनविरोधी है। हम जनता के हित में ही हड़ताल कर रहे हैं।


Source : upuklive

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