अल्फाज़ो के बाजीगर गालि‍ब का यहां हुआ था जन्म, यादों के घरौंदे इस शहर में नहीं महफूज़

गालि‍ब की पैदाइश की जगह पर बन चुका है स्‍कूल
अज़हर उमरी/ आगरा।  शायरी के बेताज बादशाह मि‍र्जा गालि‍ब आगरा की सरजमीं पर पैदा हुए , पले और बढ़े, लेकि‍न उनकी यादों के घरौंदे इस शहर में महफूज़ नहीं है। भीड़भाड़ और जदीद  चकाचौंध में गुम से हो गए हैं। उनकी याद के नाम पर सिर्फ दो मोहल्ले छोटा गालिबपुरा और बड़ा गालिबपुरा बाकी हैं। 
छोटा गालि‍बपुरा
मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म 221 साल पहले 27 दिसंबर 1797 को आगरा के पीपल मंडी इलाक़े  में हुआ था। इनका पूरा नाम असदउल्ला खां गालिब था। ज़िंदगी  की शुरुआती तालीम  भी इन्होंने यहीं से पूरी की। उन्‍होंने खुद एक जगह जिक्र किया है- 'हमारी बड़ी हवेली वह है जो लखीचंद सेठ ने खरीद ली है। उसी के दरवाजे की संगीन बारादरी पर मेरी नशिस्त थी और पास उसके एक खटिया वाली हवेली और शलीम शॉल के तकिए के पास एक दूसरी हवेली और काला महल से लगी हुई एक और हवेली और उसके आगे बढ़कर एक कटरा जो गड़रिया वालों के नाम से मशहूर था।' 
उन्‍होंने लि‍खा है- 'एक और कटरा जो कश्मीरन वाला कहलाता था, इस कटरे के एक कोने पर मैं पतंग उड़ाता था और राजा बलवान सिंह से पतंग लड़ाया करता था।' गालिब ने जिस बड़ी हवेली का जिक्र किया है वह आज भी पीपल मंडी आगरा में है। इसी इलाक़े का नाम काला महल है। किसी जमाने में यह राजा गज्ज सिंह की हवेली कहलाती थी जो जोधपुर के राजा सूरज सिंह के बेटे थे। वे यहां जहांगीर के जमाने से रहते थे।आज जिसे दुनिया भर में उर्दू के दिग्गज शायर की शक्ल में जाना जाता है, उस आलमी  शायर ने आगरा की ज़मीन  पर आंखें खोलीं। शहर की गलियों में फांके काटने के साथ जो कलाम बनाए उनको दुनिया भर में पढ़ा जाता है। वहीं उस आलमी शायर की ज़मीन  से सारी निशानियां मिटा दी गईं। 
बड़ा गालि‍बपुरा के गेट पर लगा बोर्ड भी ढंक चुका है।
मुल्क में मशहूर   शायर मिर्जा गालिब को शहर ने तो भुलाया ही, मुल्क की  हुकूमते   ने भी उनकी पैदाइशी मुक़ाम  को बचाने के कभी कोशश नहीं किए।मिर्जा गालिब जहां पैदा हुए थे , वहां एक स्कूल बन चुका है। हैरानी की बात यह है कि‍ वे जहां खेले-कूदे वहां की गलियों के लोग उन्हें जानते तक नहीं। मिर्जा गालिब काला महल में  गुलाब खाना में अपनी ननिहाल में पैदा हुए  थे। जहां उन्‍होंने अपनी आंखें खोलीं वहां अब एक स्कूल की बिल्डिंग बन चुकी है। गालिब की पैदाइशी मुकाम  अब इन्द्रभान इंटर कॉलेज के नाम से जानी जाती है।
 मिर्जा गालिब के नाम पर नाई की मंडी में छोटा और बड़ा गालिबपुरा तो है, लेकिन वहां उनकी कोई निशानी नहीं बची। गालिबपुरा में रहने वाले लोग यह भी नहीं जानते कि मुल्क  के जाने-माने उर्दू शायर मिर्जा गालिब ने इन गलियों में फांके काटने के साथ-साथ अपने सबसे बेहतरीन कलाम लिखे थे, 
मि‍र्जा गालि‍ब के मामू  की यहां हवेली थी। उसमें गालि‍ब का बचपन गुजरा था। अब इंटर कॉलेज बन गया है।
नाई की मंडी में रहने वाले समाजी कारकुन और साबिक काउंसलर  सुहैल कुरैशी के मुताबिक  नालबंद चौराहे का नाम गालिब चौक रखने का उन्‍होंने मुन्सिपल कार्पोरेशन  में तजवीज़ पेश की थी।  लेकि‍न हुकूमत  ने आज तक उस पर ख्याल  नहीं किया है।
मिर्ज़ा ग़ालिब का कुछ क़लाम 
जब लगा था ‘तीर’ तब इतना दर्द न हुआ गालिब,
ज़ख्म का एहसास तब हुआ जब ‘कमान’ देखी अपनों के हाथ में।
***************************************************
ज़िंदगी उसकी जिसकी मौत पे ज़माना अफसोस करे,
गालिब यूं तो हर शख्स आता है इस दुनिया में मरने के लिए।
************************************************
मैं तो मर के भी वज्म-ए-वफा के जिंदा हूं गालिब,
तलाश कर मेरी महफिल मेरा मज़ार न पूछ।
*************************************************
उसने मिलने की अजीब शर्त रखी…
गालिब चल के आओ सूखे पत्तों पे लेकिन कोई आहट न हो!
************************************************

Related News

Leave a Comment