जमीयत के महापुरुषों के बलिदान और संघर्ष को कभी भुलाया नहीं जा सकता : मदनी

नई दिल्ली। जमीयत उलेमा ए हिंद के नेतृत्व में जमीयत के  पूर्व प्रमुख लीडर एवं स्वतन्त्रता सेनानी मौलाना मोहम्मद अब्दुल बारी फिरंगी महली, और मौलाना अहमद सईद देहलवी की सेवाओं और कुर्बानियों पर दो दिवसीय सेमीनार सफलतापूर्वक आज मौलाना- कारी सैयद मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी की दुआ के साथ संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में विद्वानों नें दोनों महापुरुषों के जीवन और कार्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
सेमीनार में दारुल उलूम देवबन्द के उप प्रबन्धक मौलाना अब्दुल खालिक़ सम्भली,नदवातुल उलमा के विद्वान अध्यापक मौलाना अतीक़ अहमद बस्तवी,जामिया कास्मियां शाही मुरादाबाद के अध्यापक मौलाना मुफ़्ती मोहम्मद सलमान मंसूरपुरी,मुफ़्ती शब्बीर अहमद कासमी ,मज़ाहिर उलूम सहारनपुर के मौलाना सय्यद शाहिद मज़ाहिरी और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर जिनमें प्रोफेसर ज़हीरउल हसन जाफरी अध्यक्ष इतिहास विभाग दिल्ली विश्विद्यालय,प्रोफेसर अब्दुल हक़ ,प्रोफेसर अमीरेट्स दिल्ली विश्यविद्यालय,प्रोफेसर नोमान खान अध्यक्ष अरबी विभाग दिल्ली युनीवर्सिटी ,प्रोफेसर अख्तरुल वासे मौलाना आज़ाद यूनिवर्सिटी जोधपुर,डा.मुश्ताक़ अहमद तजारवी,जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी,लेखक फारूख अर्गली,प्रसिद्ध शायर गुलज़ार देहलवी,सहित अनेक शोध पत्र पढ़ने वालों ने दोनों महापुरुषों की जीवनी ,कार्यों,उपलब्धियों,सेवाओं,साहित्य और रचनाओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि बीसवीं सदी के प्रारम्भिक आधा भाग में जिन लोगों ने दीनी ज्ञान और संसार में एक साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है उनमें मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली और मौलाना अहमद सईद देहलवी प्रथम प्रष्ठ पर अंकित हैं। कई विद्यानों ने मौलाना अहमद सईद देहलवी के साहित्यिक सेवाओं विशेषकर उनके उपन्यास शौकत आरा बेगम और अज़्बेला के सन्दर्भ से प्रकाश डालते हुए कहा कि उनकी भाषा शैली प्रभावशाली और ओजस्वी थी।                       
इस अवसर पर अध्यक्ष जमीअत उलमा हिंद मौलाना कारी सैयद मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी ने कहा कि यह दोनों महान व्यक्तित्व जमीयत के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली का व्यक्तित्व जमीअत उलमा ए हिंद के लिए नीवं के पत्थर का स्थान रखता है। मौलाना उन महान व्यक्तियों में से हैं जिनकी सोच और कोशिशों से जमीअत उलमा ए हिंद का गठन हुआ। स्थापना के बाद जमीयत का आंदोलन और उसकी उपलब्धियों में जीवन पर्यंत भागीदार रहे। पहली ही बैठक में सदस्य नामित हुए और जीवन पर्यंत बने रहे। उन्होंने अपनी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार शिक्षा दीक्षा और लेखन का कार्य अपनाया, लेकिन जब देश को आवश्यकता पड़ी तो उन्होंने पठन-पाठन और खानकाह से कदम बाहर निकाला और बहुत सी सेवाओं को अंजाम दिया। उन्होंने अंजुमन खुद्दाम काबा,अंजुमन खुद्दाम हरमैन शरीफैन, खिलाफत आन्दोलन  और जमीयत उलमा ए हिंद के माध्यम से पूरी मिल्लते इस्लामिया की खिदमत की।
अध्यक्ष जमीअत उलमा ए हिंद ने कहा कि मौलाना अहमद सईद देहलवी का महान व्यक्तित्व है जो स्थापना के समय से लेकर अपनी मृत्यु तक जमीयत की सेवा तथा देश व कौम का मार्गदर्शन का कर्तव्य निभाते रहे और लगातार अपनी कोशिशों और संघर्ष के माध्यम से जमीयत को आगे बढ़ाते रहें। मौलाना अहमद सईद देहलवी ने जिस समय व्यवहारिक रूप से अपना कदम उठाया तो उस समय अंग्रेजो के खिलाफ आंदोलन चल रहे थे शायद ही कोई ऐसा आंदोलन रहा होगा जिसमें मौलाना अहमद सईद की भागीदारी न रही हो, गांधी जी का सत्याग्रह आंदोलन हो या असहयोग आंदोलन हो, सत्याग्रह, हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन हो, नेहरू रिपोर्ट विरोधी आंदोलन हो या पाकिस्तान विरोधी आंदोलन हो,हर एक में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन आंदोलनों में पूरी सरगर्मी के साथ भाग लेने में आपको अनेक बार जेलों में जाना पड़ा और बहुत सी परेशानियां उठानी पड़ी। आप जमीयत के ऐसे कर्मठ सदस्य रहे जो जमीयत की स्थापना से लेकर अपनी मृत्यु तक संघर्षशील रहे। आप जमीयत की प्रारंभिक अवधि से लगातार 20 साल तक महासचिव रहे और 17 साल उपाध्यक्ष और 2 साल अध्यक्ष पद पर आसीन रहे। राजनीतिक गतिविधियों के साथ साहित्यिक गतिविधियां भी रहीं और अनेक शैक्षिक और समाज सुधार वाली किताबें लिखीं।  अध्यक्ष जमीयत ने अंत में अपील की कि यह आवश्यक है कि हम अपने इन ऐतिहासिक महापुरुषों के जीवन से सबक हासिल करें और जमीयत के दृष्टिकोण से जुड़े रहें।
सेमिनार में दारुल उलूम देवबंद के प्रबंधक मौलाना अबुल कासिम नोमानी और दारुल उलूम नदवातुल उलमा के नाजिम मौलाना रावे हुसैन नदवी का पैगाम पढ़कर सुनाया गया, जो किन्ही कारणों से इस सेमिनार में नहीं आ सके।
इस अवसर पर परिचय पेश करते हुए जमीअत उलमा ए हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि जमीयत उलेमा ए हिंद ने पूरे सम्मान और गौरव के साथ अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं । आज का यह प्रोग्राम इसी सिलसिले में दीनी, धार्मिक व राष्ट्रीय और सामाजिक संस्था जमीअत उलमा ए हिंद के उन महापुरुषों, अध्यक्षों और महासचिवों  तथा क्रांतिकारी और संघर्षशील व्यक्तियों की सेवाओं और उपलब्धियों का परिचय कराने के लिए आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आजादी के आंदोलन से लेकर देश की आजादी प्राप्त करने तक इस जमात का महत्वपूर्ण और संघर्षशील चरित्र रहा है। आजादी के बाद दंगों के लंबे और भयानक सिलसिले के दौरान जमीअत उलमा ए हिंद के एकता और सद्भाव वाले कारनामों का एक बड़ा इतिहास है।
फिरंगी महली खानदान के सुपुत्र मौलाना खालिद रशीद फिरंगी ने अपने विचारों में कहा कि मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी जैसे ऐतिहासिक पुरुष की सेवाओं को वर्णित करने में बहुत समय चाहिए। आपका पालन - पोषण फिरंगी महल में हुआ। आपको अल्लाह ताला ने विशेष प्रतिभाएं दी थीं । इसका बड़ा प्रमाण यह है कि उन्होंने सिर्फ 48 साल की उम्र में 113 किताबें लिखी हैं।  आप इस्लामी मिल्लत और भारत तथा मुस्लिम एकता के बड़े कर्णधार थे। इसी उद्देश्य से आपने खिलाफत आंदोलन कमेटी गठित की और फिर जमीअत उलमा के गठन सम्मेलन की अध्यक्षता की।
अमीर जमीअत अहले हदीस हिंद मौलाना असगर अली इमाम मेहंदी सल्फी ने कहा कि आज मुझे प्रसन्नता हो रही है कि हम ऐसे महान व्यक्तित्व से संबंधित सम्मेलन में भाग ले रहे हैं जो हमारे महापुरुष थे। जिन का उदाहरण दुनिया प्रस्तुत नहीं कर सकती । आवश्यकता यह है कि उनके जीवन संघर्ष, सेवाओं और उपलब्धियों से प्रकाश प्राप्त करके हम भविष्य का मार्ग निर्धारित करें।
इन व्यक्तियों के अलावा प्रोफेसर शरीफ हसन कासमी दिल्ली पूर्व अध्यक्ष फारसी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय, मौलाना नदीमउल वाजदी देवबंद, मौलाना सलमान बिजनौरी देवबंद, मौलाना मतीन उल हक ओसामा कानपुर, मौलाना डॉ. असजद कासमी मुरादाबाद, मौलाना हमज़ा कासमी दिल्ली विश्वविद्यालय, अदनान अब्दुल वाली फिरंगी महली लखनऊ, डॉक्टर शमीम अख्तर कासमी कोलकाता, प्रोफेसर डॉक्टर अबू बकर उर्दू विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय, डॉक्टर वारिस मजहरी इस्लामियात विभाग हमदर्द यूनिवर्सिटी, डॉक्टर मुनव्वर हुसैन कमाल संपादक एवाने अदब उर्दू दिल्ली आदि ने अपने शोध पत्र और विचार प्रकट किए।
इनके अलावा स्टेज पर मौलाना सैयद शाहिद अमीन सहारनपुर, हाफिज पीर शब्बीर अहमद हैदराबाद, राशिद सईद ,मौलाना हाफिज नदीम सिद्दीकी महाराष्ट्र, मौलाना मुईज़ुद्दीन अहमद, मौलाना याहिया करीमी ,मौलाना जियाउल हक खैराबादी, मौलाना अख्तर इमाम आदिल, डॉक्टर मसूद आजमी, मौलाना नियाज़ अहमद फारुकी और सेमिनार के कन्वीनर मौलाना इमरान उल्लाह कासमी और डॉक्टर अब्दुल मलिक रसूलपुरी मौजूद रहे।

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