15 अगस्‍त 1947 को सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन कर रहे थे महात्‍मा गांधी

मोहम्मद ज़ाहिद 
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आन्दोलन चला , इसमें कोई विरोधाभास नहीं है , वर्षों की जद्दोजहद के बाद देश को स्वतंत्रता भी मिली , पर जब देश स्वतंत्रता मिलने का जश्न मना रहा था तब गाँधी जी कहाँ थे ?

महात्‍मा गांधी 15 अगस्‍त 1947 को बंगाल के "नोआखली" में हिंदू-मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन कर रहे थे।

नेहरू और पटेल ने महात्मा गांधी को ख़त भेजकर बताया था कि 15 अगस्त को देश का पहला स्वाधीनता दिवस मनाया जाएगा , पर गांधी जी फिर भी उस समारोह में नहीं आए। उन्‍होंने खत के जरिए कहा था, जब हिंदु-मुस्लिम एक-दूसरे की जान ले रहे हैं, ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूँ'।

सोचिएगा , कि इसरो के फ्लापशो का क्रेडिट लेने के लिए रातभर जगने वाले अपने नऊके "फादर आफ नेशन" यदि गाँधी जी की जगह होते तो क्या करते ?

मेगा शो हो रहा होता , इवेन्ट हो रहा होता और कम से कम 5-6 घंटे भाषणबाजी करके इस स्वतंत्रता आंदोलन के सफल होने का श्रेय ले रहे होते। देश दंगे में जलता रहता और भाषण जारी रहता।

जबकि गाँधी जी ने कभी नहीं कहा कि देश को आज़ादी उन्होंने दिलाई। बल्कि आज़ादी के बाद भड़के सांप्रदायिक दंगों को बुझाने के लिए वह प्रयासरत रहे।

दिल्ली में हिंसक घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। 20 दिसंबर, 1947 को गांधी जी ने लगभग झल्लाते हुए लिखा,

“यदि यह हमारी इच्छा है कि मुसलमान भारत छोड़ दें तो ये हमें साफ-साफ कहना चाहिए या सरकार को ये ऐलान कर देना चाहिए कि भारत में मुसलमानों का रहना सुरक्षित नहीं है।”

और फिर गांधी जी ने अपना सबसे कामयाब तरीका अपनाया।

13 जनवरी, 1948 को उन्होंने बिड़ला हाउस में इन दंगों के खिलाफ आमरण अनशन शुरू कर दिया। नेहरू, ‘द स्टेट्समैन’ के पूर्व संपादक आर्थर मूर और हजारों अन्य लोग गांधी के साथ अनशन पर बैठ गए। गाँधी जी का अनशन खत्म करने की नेहरू पटेल तक ने तमाम कोशिशें की पर गाँधी जी डटे रहै और फिर , 18 जनवरी 1948 को सुबह 11.30 बजे सभी लोग गांधीजी से मिले और शांति के लिए गांधीजी ने जो शर्ते रखी थीं, उसे स्वीकार किया और ‘शांति शपथ’ प्रस्तुत किया। इसके बाद गांधीजी ने उपवास के अंत की घोषणा की।

ऐसे होते हैं राष्ट्रपिता , नये वाले फादर आफ नेशन तब होते तो क्या करते ? गुजरात देख कर समझ जाईए।
(लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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