कश्मीर बनकर रह गए हैं यूपी और एमपी के 8 लाख नौजवान!

रवीश कुमार 
मेरे व्हाट्स एप के इनबॉक्स में सुबह से पांच सौ से अधिक मेसेज आ चुके हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारी परीक्षाओं से तंग आए ये नौजवान मिनट-मिनट पर टाइप किया हुआ मेसेज भेज रहे हैं। उन तमाम मेसेज में कश्मीर पर एक शब्द नहीं हैं। इनकी चिन्ताओं में कश्मीर नहीं है। सरकारी परीक्षा का रिज़ल्ट नहीं निकला है और नौकरी नहीं मिल रही है, इसलिए ख़ुद को उदास बताते हैं और कुछ तो जीवन ख़त्म कर लेने की बात करते हैं। बहुत सारे मेसेज में मीडिया के बिक जाने की बात है। उनका कहना है कि मैं ही उनका एकमात्र सहारा हूं जो उनकी बात करता हूं।

रुकिए। इस बात के आधार पर आप यह भ्रम न पालें कि ये नौजवान मीडिया के बिकने और तटस्थ होने की गहरी समझ रखते हैं। अगर मीडिया को लेकर इनकी समझ साफ़ होती तो ये कहते हैं कि कश्मीर में मीडिया का गला घोंट दिया गया है, उसी तरह हमारी आवाज़ दबा कर हमें भी कश्मीर के जैसा बना दिया गया है। वे न अपने लिए मीडिया की आज़ादी मांगते हैं और न कश्मीर के लिए। क्योंकि तब उन्हें यह समझना होगा कि उनकी ही चुनी हुई सरकार ने मीडिया के लिए मीडिया होना कितना मुश्किल कर रखा है। वे उस राजनीति की आवाज़ बनते हैं जो मीडिया की आवाज़ को ख़त्म करती है और बाद में उनकी भी आवाज़ को ख़त्म कर देती है।

कश्मीर की आबादी सवा करोड़ है। यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश की सरकारी परीक्षाओं के सताए नौजवानों की संख्या कश्मीर की आबादी से अधिक है। इसमें रेलवे के ग्रुप डी के परीक्षार्थियों की संख्या शामिल नहीं है। इतनी बड़ी संख्या में नौजवान मीडिया के स्पेस से बाहर कर दिए गए हैं। ये तड़प रहे हैं। मिनट-मिनट मुझे मेसेज कर रहे हैं कि मैं प्राइम टाइम में इनकी आवाज़ उठाऊं। मुझसे एक बार भी नहीं कहते हैं कि मैं कश्मीर पर चर्चा करूं। मेरी टाइम लाइन में कश्मीर की बात ही नहीं है। नौकरी की बात है और नौकरी की बात करने वालों का हाल कश्मीर के जैसा है। वे भी कश्मीर की तरह सूचनाविहीन प्रदेश में रह रहे हैं। न सरकार उनसे बात करती है और मीडिया उनकी बात करता है।

मैं इन नौजवानों की मानसिक परेशानी से बहुत दुखी हूं। तमाम मेसेज को डिलिट करने से पहले एक चुभन होती है। कितनी उम्मीद और तकलीफ़ से गुज़र कर किसी ने यह लिखा होगा। मैं जानता हूं कि मैं कुछ नहीं कर सकता। फेसबुक पर लिख देता हूं। उसी से वे ख़ुश हो जाते हैं। मैं कश्मीर के बाहर के इन नौजवानों को कश्मीर की तरह सूचनाविहीन और उम्मीदविहीन होते देख रहा हूं। मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। ये नौजवान अच्छे हैं। इन्हें किस बात की सज़ा दी जा रही है। क्या इसकी सज़ा दी जा रही है कि ये मीडिया और सरकार के खेल को नहीं समझते हैं।

मैं फोन नहीं उठाता हूं फिर भी आधी रात के बाद भी फोन पर कोई नंबर फ्लैश कर रहा होता है। अजीब सा सन्नाटा पसर जाता है। लाइन के उस तरफ़ कोई नौजवान कितना परेशान होगा। वह हर तरफ से थक गया है। मंत्रियों के ट्विटर हैंडल पर मेसेज करने के बाद मेरे इनबाक्स में आ गया है। मैं सैंकड़ों फोन नहीं उठा सकता। कभी-कभार उठाया तो जिन नौजवानों को गुरुर से बात करना चाहिए वो गिड़गिड़ा रहे होते हैं। रो रहे होते हैं। मैं कश्मीर नहीं गया लेकिन वहां के नौजवानों की सिसकियां उत्तर भारत के नौजवानों की सिसकियों सी लगती है। बस मैं कश्मीर के नौजवानों के संपर्क में नहीं हूं। यूपी और मध्य प्रदेश के नौजवान मेरे संपर्क में हैं।

एडिटर्स गिल्ड ने एक बयान जारी किया है। कश्मीर में सूचना पर प्रतिबंध है। स्थानीय मीडिया को रिपोर्ट करने नहीं दिया जा रहा है जो ज़मीन पर लोगों की आंख और कान होते हैं। निष्पक्ष रिपोर्टिंग और प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त हो गई है। बिना इंटरनेट के ख़बरों को पहुंचाना संभव नहीं है। यह सरकार जानती है। कश्मीर में जिस तरह के हालात हैं वहां पर प्रेस का लोकतांत्रिक दायित्व निभाना ज़रूरी है। पत्रकारों को पास के नाम पर रोका जा रहा है।

मैंने यह बात इसलिए लिखी है कि ताकि मुझे मेसेज करने वाले नौजवानों को कश्मीर का मुद्दा मिल जाए। वो एडिटर्स गिल्ड के इस बयान के बहाने भीड़ बन कर प्रेस की स्वतंत्रता घोंटने का समर्थन करने लगेंगे। यह हो जाएगा तो इससे सरकार का काम आसान हो जाएगा। मुझे इन नौजवानों से कोई उम्मीद नहीं है। फिर भी इनसे एक मोह है। मेरे करीबी मना करते हैं कि इनकी बात न लिखूं, मैं फिर भी इनकी बात लिखता रहूंगा। इनकी नौकरी की बात करूंगा। क्या बदले में इनसे यह उम्मीद करना गुनाह है कि ये मीडिया की स्वतंत्रता का समर्थन करें? अगर है तो ये नौजवान मुझे मेसेज करते रहेंगे, अगर नहीं है तो कल से मेसेज करना बंद कर देंगे।

वैसे आज कई परीक्षाओं के सताए नौजवानों ने पत्र लिखा है। मुझे पता है कि आप कश्मीर से कोई सहानुभूति नहीं रखते। उनकी बहू बेटियों के साथ कुछ भी करने की बात करने वालों को आप नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। फिर भी मैं एक सूची रखना चाहता हूं।

1.2016 में यूपी में सहायक कोषागार और लेखाकार की भर्ती निकली थी। 16000 पद थे। सपा सरकार में साक्षात्कार हुआ। 2017 में भाजपा सरकार आई और साक्षात्कार कैंसल कर दिया। फिर दिसंबर 2018 में साक्षात्कार हुआ। अभी तक रिज़ल्ट नहीं आया है। ये लिखते हैं कि तीन साल से मानसिक रूप से परेशान हैं। लेकिन क्या इन्होंने कभी मीडिया की स्वतंत्रता के सवाल पर कभी कोई मेसेज किया है? नहीं।

2. उत्तर प्रदेश में मदरसा आधुनिकीकरण का केंद्र का प्रोजेक्ट चल रहा है। इसके तहत 26,000 शिक्षकों को 41 महीने से केंद्र का अंश नहीं मिला है। मेसेज करने वाले इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि वे हिन्दू हैं। अपनी जाति बता रहे हैं ताकि पढ़ने वाला यह न समझे कि मदरसे का मामला मुसलमानों का है तो छोड़ दो। जो परा-स्नातक है कि उसका हर महीने 12000 के हिसाब से बकाया है। एक शिक्षक को करीब पांच लाख मिलना चाहिए जो कि नहीं मिला है। वे चाहते हैं कि रवीश कुमार इनकी आवाज़ उठाए और मोदी सरकार इन्हें पांच लाख का चेक दे दे। लेकिन क्या इन्होंने कभी मीडिया की स्वतंत्रता के सवाल पर कभी कोई मेसेज किया है? नहीं।

3. यूपी के 31,000 अनुदेशक परिवार चाहते हैं कि सरकार 17000 रुपये प्रति माह देने का आदेश जल्दी जारी करे। लगता है कि सभी 31,000 अनुदेशक मुझे मेसेज करके ही मानेंगे। लेकिन क्या इन्होंने कभी मीडिया की स्वतंत्रता के सवाल पर कभी कोई मेसेज किया है? नहीं।

4. मध्य प्रदेश की सरकार भी शिक्षकों के रिज़ल्ट घोषित नहीं कर रही है। वहां से बहुत सारे नौजवानों ने लिखा है कि शिक्षक भर्ती परीक्षा वर्ग 1 और 2 का परिणाम नहीं आ रहा है। एक तो भाजपा सरकार के जाने के 8 साल बाद परीक्षा हुई लेकिन कांग्रेस सरकार में 7 महीने हो गए, रिज़ल्ट नहीं आया है। इन्होंने बताया है कि 7 लाख नौजवान परिणाम का इंतज़ार कर रह हैं। ये चाहते हैं कि मैं कांग्रेस सरकार का ध्यान आकर्षित करूं। लेकिन क्या इन्होंने कभी मीडिया की स्वतंत्रता के सवाल पर कभी कोई मेसेज किया है? नहीं।

मैंने सिर्फ इस एक लेख में करीब 8 लाख नौजवानों की पीड़ा दर्ज की है। मगर इनकी संख्या शून्य में बदल चुकी है। इन्हें पहले से पता है कि शून्य हो चुके हैं। ये अपने प्रति शून्य हो चुके हैं। कश्मीर इनके लिए शून्य हो चुका है। मैं 8 लाख नौजवानों के सैंपल से बता सकता हूं कि इनमें से कोई कश्मीर को लेकर चिन्तित नहीं है। कम से कम अपने मेसेज में नहीं लिखा है। इनमें से कोई भी मीडिया की आज़ादी को लेकर चिन्तित नहीं है।

क्या इन्हें नौकरी मिल जाएगी? मैं चाहूंगा कि मिले। मैं इनके मेसेज को पूरी तरह कबाड़ में नहीं फेंक सकता जैसा कि सरकारों ने फेंक दिया है। आपको बताया तो कि मुझे इनसे मोह है। मैं चाहूंगा कि नरेंद्र मोदी, आदित्यनाथ और कमलनाथ यूपी और मध्य प्रदेश के आठ लाख नौजवानों को नौकरी दे दें। आखिर कश्मीर का पुनर्गठन भी सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए किया गया है। तो फिर यूपी और मध्य प्रदेश के नौजवानों को सरकारी नौकरी क्यों नहीं मिल रही है।

मुझसे लगातार पूछे जाने वाले 4 प्रश्नों के जवाब-

1. क्या मैं इन नौजवानों की बात करता रहूंगा? तब भी जब ये बीजेपी के वोटर हैं?

जवाब- मैं इन नौजवानों की बात करूंगा। टीवी पर नहीं करूंगा। क्योंकि मेरे पास संसाधन नहीं है और इन नौजवानों ने मेरी लड़ाई में साथ भी नहीं दिया। लेकिन मैं फेसबुक पर इनकी कहानी नियमित रूप से लिखूंगा। मुझे पता है कि ये नौजवान बीजेपी के आजीवन वोटर हैं। बीजेपी अपने वोटर के साथ क्या करेगी, वो जाने, मैं किसी वोटर से इस आधार पर भेदभाव नहीं करूंगा कि वह बीजेपी का वोटर हो है। यह मेरा प्रण है।

2.- मेरे इस पत्र में आठ लाख नौजवानों की पीड़ा है। क्या यह पत्र आठ लाख शेयर होगा?

जवाब- नहीं। इनमें से कई इसलिए नहीं शेयर करेंगे क्योंकि ये अपने पेज पर मुझे गालियां देते हैं। या उस राजनीतिक दल का समर्थन करते हैं जिसकी सरकार ने उनकी मांग अनसुनी कर दी है।

3. क्या ये नौजवान मुझे नौकरी मिलने पर श्रेय देंगे?

जवाब- मुझे इसकी परवाह नहीं है। इन्हें नौकरी मिल जाए काफी है। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और मुख्यमंत्री कमलनाथ को इन्हें नौकरी देनी होगी। इन नौजवानों ने परीक्षा फीस दी है, इम्तहान दिया है, इंटरव्यू दिया है। इन्हें नौकरी मिलनी चाहिए। जब तक नहीं मिलेगी तब तक पत्र लिखता रहूंगा। मैं किसी शर्त के बदले इनके मुद्दे के साथ नहीं हूं। मुझे पता है नौकरी मिलने के बाद ये मेरे साथ नहीं होंगे।

4. तो फिर मैं यह क्यों कर रहा हूं?

जवाब- यही मेरा काम है। किसी की पीड़ा की कहानी कह कर आगे बढ़ जाना। अगर इन्हें नौकरी मिलेगी तो मुझे ख़ुशी होगी। मैं चाहता हूं कि प्राइम टाइम के एंकर सरकार की चापलूसी छोड़ सरकार बनाने वाले नौजवानों की सेवा करें। मैं बिना किसी आशा के सेवा करना चाहता हूं। मुझे पता है कि ये मुझे ठुकरा देंगे। इन्हीं में से कोई मुझे गाली देगा। देता भी है। मारने आएगा। तब भी मैं इन्हीं की बात करूंगा।

आशा है नौकरी सीरीज़ पर मेरे लेख लिखने के बाद मेरे परिचित इस तरह के प्रश्न नहीं करेंगे। आशा है कि लाखों नौजवान मीडिया की स्वतंत्रता पर कोई आवाज़ नहीं उठाएंगे। आशा है कि वे रवीश कुमार को अपनी आवाज़ उठाने के लिए पत्र लिखते रहेंगे। मैं आशाओं से भरा हूं। मैं ज़िंदा हूं। जो ज़िंदा नहीं है, वो जाने। जय हिन्द।
(लेखक मशहूर पत्रकार व न्यूज़ एंकर हैं)

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