मानव तस्करी न सिर्फ एक सामाजिक बुराई, बल्कि मानवता के विरुद्ध एक हिंसक अपराध: नायडू

अज़हर उमरी, नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने सरकारी एजेंसियों, नागरिक समाज और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) का आह्वान करते हुए कहा है कि मानव तस्करी के खिलाफ ठोस, कठोर और अनवरत ढंग से लड़ाई को और तेज़ करने के लिए अपने प्रयासों में समन्वय करें।

उन्होंने विचार रखा कि मानव तस्करी के खिलाफ युद्ध को तब तक जारी रखना होगा जब तक इसका आखिरी पीड़ित बचा नहीं लिया जाता, उसका पुनर्वास नहीं कर दिया जाता और इसके आखिरी दोषी को सजा नहीं दिला दी जाती।

डॉ. सुनीता कृष्णन और उनके एनजीओ 'प्रज्जवला' द्वारा यौन तस्करी के पीड़ितों के घरों के गृह प्रबंधन के लिए तैयार की गई प्रशिक्षण पुस्तिका आज हैदराबाद में जारी करने के बाद आयोजन में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि मानव तस्करी केवल एक सामाजिक बुराई नहीं है बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा वह मानवता के ही खिलाफ एक हिंसक अपराध है। उन्होंने सुझाव दिया कि लोगों की बेहतर समझ के लिए इस प्रशिक्षण पुस्तिका का अनुवाद स्थानीय भाषाओं में भी किया जाए।

उन्होंने कहा, “मानव तस्करी एक ऐसा खतरा है जो मानव अधिकारों, न्याय, गरिमा के सभी बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और इसे अकसर आधुनिक काल की गुलामी कहा जाता है”।

 उनका कहना था कि जो मूल अधिकार हमारे संविधान की आधारशिला निर्मित करते हैं वे प्रत्येक नागरिक के आज़ादी के निर्विवाद अधिकार और शोषण व सभी प्रकार के जबरदस्ती के श्रम, बाल श्रम और तस्करी के खिलाफ अपरिहार्य अधिकार की गारंटी देते हैं।

हमारे देश के हर नागरिक के पास एक सुरक्षित और सम्मान भरा जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए यह मत रखते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमारा संविधान हरेक नागरिक को ये पवित्र दायित्व देता है कि वो मानव तस्करी को मिटाने के लिए कड़ी मेहनत करें।

उन्होंने कहा, “हमारे पूरे समाज को इस कार्य के लिए एकजुट होना चाहिए। इस अपराध की प्रकृति के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हमें अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए और पीड़ितों को बचाने और उनका पुनर्वास करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए”।

श्री नायडू ने लोगों को प्रोत्साहित करने का आह्वान किया कि वे मानव तस्करी से बचने वाले पीड़ितों को सामान्य जीवन जीने और समाज की मुख्यधारा में फिर से जुड़ने के लिए अपना समर्थन और मदद दें।

तस्करी में बचने वालों को विभिन्न सेवाएं प्रदान करने वाले हितधारकों के लिए पीड़ितों और तस्करी से उन पर होने वाले असर को समझना सर्वाधिक महत्व की बात है, यह कहते हुए उपराष्ट्रपति ने राय रखी कि सभी हितधारकों को पीड़ितों की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, वित्तीय और आध्यात्मिक सेहत पर उनके साथ हुई हिंसा, क्रूरता, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न से पड़ने वाले असर को पहचानना चाहिए।

श्री नायडू ने कहा कि तस्करी से बचे पीड़ित स्वस्थ हो पाएं और सामान्य जीवन जी सकें इसके लिए एक सक्षमकारी और मददगार तंत्र का बनाया जाना और पीड़ितों को शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के नए रास्ते मुहैया करवाना सबसे महत्वपूर्ण बात है।

उन्होंने कहा, “बाल पीड़ितों के मामले में विशेष ख़याल रखे जाने की जरूरत है क्योंकि जिस सदमे और आघात से वे गुजरे हैं वो बहुत ज्यादा होगा। उनकी पूरी रिकवरी हो सके इसके लिए उन्हें ऊंचे स्तर की देखभाल चाहिए होगी”।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि इनकी देखभाल और हिफाज़त के लिए बनाए गए सुरक्षा गृह ऐसे गंभीर अत्याचारपूर्ण हालातों से आने वाले पीड़ितों के समग्र पुनर्वास के लिए एक सक्षमकारी माहौल पैदा करने के मामले में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “जब पीड़ितों को शोषणकारी स्थितियों में से बचाया जाता है और वे ऐसी हिंसा के नतीजतन गंभीर प्रभावों से पीड़ित होते हैं, तब अपने पूर्ण पुनर्वास की दिशा में उनकी पहली और सबसे आवश्यक जरूरत एक सुरक्षित जगह और आश्रय की होती है”।

प्रज्जवला के प्रयासों को अपना समर्थन देने और प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उपराष्ट्रपति ने अपनी एक महीने की तनख्वाह इस संगठन को देने की घोषणा की जो मानव तस्करी के पीड़ितों की देखभाल करता आ रहा है।

इससे पहले उपराष्ट्रपति ने मानव तस्करी पर एक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। महिला एवं बाल कल्याण राज्य मंत्री सुश्री देबाश्री चौधरी, प्रज्जवला एनजीओ की संस्थापक डॉ. सुनीता कृष्णन और अन्य गणमान्य लोग भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति द्वारा दिया गया भाषण इस प्रकार हैः

“मानव तस्करों से बचाए गए पीड़ितों के आश्रय गृहों के लिए गृह प्रबंधन प्रशिक्षण पुस्तिका को जारी करने के इस मौके पर उपस्थित होकर मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है।

सबसे पहले मैं डॉ. सुनीता कृष्णन और उनके तस्करी-विरोधी अग्रणी संगठन 'प्रज्जवला' एनजीओ द्वारा किए जा रहे शानदार कार्य की प्रशंसा करना चाहूंगा।

मुझे यह जानकर खुशी है कि 1996 में छोटी सी शुरुआत करने वाले 'प्रज्जवला' की आज पूरे भारत में मौजूदगी है और यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी संचालित हो रहा है। यह वाकई में ध्यान देने वाली बात है कि 'प्रज्जवला' का काम मानव तस्करी के पीड़ितों के लिए रोकथाम, संरक्षण, बचाव, पुनर्वास और समाज की मुख्यधारा में उनके पुनर्घटन के पांचों स्तंभों का दायरा तय करता है।

मुझे खुशी है कि 'प्रज्जवला' अब मानव तस्करी के पीड़ितों के हक में आवाज़ उठाने और उनके लिए समग्र सेवाएं सुरक्षित करने की दिशा में काम करने वाली राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सबसे ताकतवर आवाजों में से एक बन गया है।

मेरे प्यारे बहनो और भाइयो,

मानव तस्करी महज़ एक सामाजिक बुराई नहीं बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा है। यह पूरी मानवता के ही खिलाफ एक हिंसक अपराध है। यह एक ऐसा खतरा है जो मानव अधिकारों, न्याय और गरिमा के सभी बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और इसे अकसर आधुनिक काल की गुलामी कहा जाता है।

हर साल वैश्विक स्तर पर हजारों पुरुष, महिलाएं और बच्चे तस्करों के हाथों में पड़ते हैं। पीड़ितों के उद्गम, पारगमन और गंतव्य वाले देश के तौर पर दुनिया में तकरीबन हर देश ही इस तस्करी से ग्रस्त है।

कुछ मामलों में तस्कर पीड़ितों और अन्य लोगों से छल करते हैं, उन्हें ठगते हैं और शारीरिक रूप से मजबूर करते हैं। इन पीड़ितों से झूठ बोला जाता है, उन पर हमला किया जाता है, धमकाया जाता है या चालाकी से उनसे अमानवीय, गैर-कानूनी और अस्वीकार्य परिस्थितियों में काम करवाया जाता है।

इंसानों की तस्करी करना पूरी दुनिया में एक संगठित अपराध बन चुका है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात है कि यह ऐसा अपराध है जो अकसर आम नजरों के बीच भी छुपा रहता है और देशों के सामाजिक, आर्थिक ढांचों और लोगों की जिंदगियों को बर्बाद कर रहा होता है।

यह वाकई में चिंता का विषय है कि भारत भी जबरदस्ती के श्रम या यौन उत्पीड़न के लिए पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की तस्करी की समस्या का सामना कर रहा है। '2016 में भारत में अपराध की रिपोर्ट' के वार्षिक आंकड़ों में उजागर हुआ है कि भारत के सभी राज्यों में मानव तस्करी के मामले सामने आए हैं।



शुक्र है कि सरकार के मेहनती प्रयासों की वजह से और प्रज्जवला जैसे समर्पित नागरिक समाज समूहों के कार्य की वजह से 2016 में 23,000 से भी ज्यादा पीड़ितों को बचाया जा सका।

हम यह होने नहीं दे सकते कि ये घृणित अपराध इंसानी ज़िंदगियों पर कहर बरपाता रहे। यहां तक कि अगर एक भी इंसानी पीड़ित है तो वह 'बहुत ज्यादा पीड़ितों' के बराबर है।



प्यारे बहनो और भाइयो,

मुझे भरोसा है कि सरकारी एजेंसियां, नागरिक समाज और गैर-सरकारी संगठन मानव तस्करी के खिलाफ ठोस, कठोर और निरंतर ढंग से लड़ाई को और तेज़ करने के लिए अपने प्रयासों में समन्वय करेंगे। मानव तस्करी के खिलाफ युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक इसका आखिरी पीड़ित बचा नहीं लिया जाता, उसका पुनर्वास नहीं कर दिया जाता और जब तक इसके आखिरी अपराधी को सजा नहीं दिला दी जाती।

हमारे संविधान की आधारशिला रचने वाले मूलभूत अधिकार प्रत्येक नागरिक की आज़ादी के निर्विवाद अधिकार और शोषण व सब प्रकार के जबरदस्ती के श्रम, बाल श्रम, तस्करी के खिलाफ अपरिहार्य अधिकार की गारंटी देते हैं।

इस देश के हर नागरिक के पास सुरक्षित और सम्मान भरा जीवन जीने का अधिकार है।

हमारा संविधान हम में से हर एक नागरिक को ये पवित्र दायित्व देता है कि हम मानव तस्करी को मिटाने के लिए कड़ी मेहनत करें। इस कार्य के लिए पूरे समाज को एकजुट होना होगा।

इस अपराध की प्रकृति के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हमें हमारा सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए और पीड़ितों को बचाने और उनका पुनर्वास करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

लोगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे मानव तस्करी के पीड़ितों को सामान्य जीवन जीने और समाज की मुख्यधारा में फिर से जुड़ने के लिए अपना समर्थन और मदद दें।

 तस्करी में बचने वालों को विभिन्न सेवाएं प्रदान करने वाले हितधारकों के लिए पीड़ितों और तस्करी से उन पर होने वाले असर को समझना सबसे अधिक महत्व की बात है। सभी हितधारकों को पीड़ितों की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, वित्तीय और आध्यात्मिक सेहत पर उनके साथ हुई हिंसा, क्रूरता, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न से पड़ने वाले असर को पहचानना चाहिए।

जहां तक अपराध के असर की बात है तो वह उस उद्देश्य पर निर्भर करता है जिसके लिए संबंधित इंसान की तस्करी की गई है, लेकिन आमतौर पर देखा गया है कि जो यौन तस्करी के पीड़ित होते हैं वे अपने जिस्मों और अपने मानस दोनों पर बहुत गंभीर क्षति की पीड़ा झेलते हैं।



ये पीड़ित शर्म और पश्चाताप से ग्रस्त होते हैं और अकसर अपनी इस बुरी दशा के लिए खुद को कुछ हद तक जिम्मेदार मानते हैं और स्वयं को दोष देते हैं। इस तरह की परिस्थितियों से बहुत से पीड़ितों को छुड़वाया जाता है।

तस्करी से बचे पीड़ित स्वस्थ हों और सामान्य जीवन जी सकें इसके लिए एक सक्षमकारी और मददगार पारिस्थितिकी तंत्र बनाना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। साथ ही साथ उनकी चिकित्सकीय सहायता, काउंसलिंग और थैरेपी सुनिश्चित करवाने के लिए हमें पीड़ितों के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के नए रास्ते मुहैया करने होंगे।

पीड़ित अगर बच्चे हैं तो उनके मामले में विशेष ख़याल रखे जाने की जरूरत है क्योंकि जिस सदमे और आघात से वे गुजरे हैं वो बहुत ज्यादा होगा। उनकी पूरी रिकवरी हो सके इसके लिए उन्हें ऊंचे स्तर की देखभाल चाहिए होगी।

वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने 30 जुलाई को व्यक्तियों की तस्करी के खिलाफ विश्व दिवस निर्धारित किया था। संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव में घोषणा की गई कि ऐसा एक दिन 'मानव तस्करी के पीड़ितों की स्थिति को लेकर जागरूकता फैलाने और उनके अधिकारों के प्रचार व संरक्षण के लिए' जरूरी है।

अंतर्राष्ट्रीय दिवस ऐसे अवसर होते हैं जब चिंताजनक मसलों पर लोगों को शिक्षित करने, वैश्विक समस्याओं को संबोधित करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और संसाधन जुटाने, और मानवता की उपलब्धियों का जलसा मनाने व उन्हें सुदृढ़ करने का काम किया जा सके।

जब पीड़ितों को शोषणकारी परिस्थितियों से बचाकर निकाला जाता है और वे ऐसी हिंसा के नतीजतन गंभीर प्रभावों से पीड़ित होते हैं, तब अपने पूर्ण पुनर्वास की दिशा में उनकी पहली और सबसे आवश्यक जरूरत एक सुरक्षित जगह और आश्रय की होती है।

देखभाल और हिफाज़त के लिए बनाए गए सुरक्षा गृह ऐसे गंभीर अत्याचारपूर्ण हालातों से आने वाले पीड़ितों के समग्र पुनर्वास के लिए एक सक्षमकारी माहौल पैदा करने के मामले में गंभीर चुनौतियों का सामना करते हैं।

 मैं समझता हूं कि इस संकट ने डॉ. सुनीता कृष्णन द्वारा इस गृह प्रबंधन पुस्तिका को विकसित करने के लिए आधार तैयार किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह पुस्तिका ऐसा ज्ञान और कुशलता निर्मित करेगी जिससे तस्करी किए गए पीड़ित की विशिष्ट मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों का सामना करने और गृह प्रबंधन के लिए कानूनी रूप से स्वीकार्य तरीकों पर एक समझ पैदा करने में मदद मिलेगी।

यह मेरी ईमानदार आशा है कि सभी सरकार और एनजीओ द्वारा चलाए जाने वाले आश्रय गृह इस गृह प्रबंधन पुस्तिका को उपयोग में लाएंगे जो कि डॉ. सुनीता कृष्णन और प्रज्जवला के बेहद सक्षम स्टाफ के दो दशक से भी ज्यादा लंबे सामूहिक अनुभवों का परिणाम है।

जहां सरकारी कदम बेहद महत्वपूर्ण हैं वहीं इस अपराध को रोकने का दारोमदार हम में से हर एक इंसान पर है। हमारी मेहनत और साहस वाकई में लोगों की जिंदगी बचा सकता है।

मैं एक बार फिर डॉ. सुनीता कृष्णन और 'प्रज्जवला' को बधाई देता हूं और अपनी शुभकामनाएं देता हूं और उम्मीद करता हूं कि वे आने वाले दिनों में भी मानवता की इस असाधारण सेवा को करना जारी रखेंगे

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